आओ करें महफ़िल पे ज़रे ज़ख़्म नुमायां
चर्चा है बहुत बे सरो सामानि ए दिल का
ऐ मेरे दिल , माना कि तुम्हारा मौन तुम्हारी गम्भीरता और सदाशयताके नाते है, लेकिन अब इसकी व्याख्या तुम्हारी अकिञ्चनता के रूप में होने लगी है। वक़्त है कि तू बता दे कि तू सरापा नाला ए मुहब्बत है।तेरी चुप्पी अपने असामर्थ्य से नहीं बल्कि श्रवण केधैर्य की अनुपलब्धता के कारण थी।
बता कि तेरा हर दाग़े दिल इक तुख़्म है सर्वे चराग़ां का ।
फ़िराक़ के सन्देशको सुन
शामे ग़म कुछ उस निगाहे नाज़ की बातें करो
बेख़ुदी बढ़ने लगी है राज़ की बातें करो
हो रहा है जहान में अन्धेर........ हदीसे शोलारुख़ां का श्रीगणेश कर।