शनिवार, 4 जुलाई 2009

भाषा एवं साहित्य

आओ करें महफ़िल पे ज़रे ज़ख़्म नुमायां

चर्चा है बहुत बे सरो सामानि ए दिल का

ऐ मेरे दिल , माना कि तुम्हारा मौन तुम्हारी गम्भीरता और सदाशयताके नाते है, लेकिन अब इसकी व्याख्या तुम्हारी अकिञ्चनता के रूप में होने लगी है। वक़्त है कि तू बता दे कि तू सरापा नाला ए मुहब्बत है।तेरी चुप्पी अपने असामर्थ्य से नहीं बल्कि श्रवण केधैर्य की अनुपलब्धता के कारण थी।

बता कि तेरा हर दाग़े दिल इक तुख़्म है सर्वे चराग़ां का ।

फ़िराक़ के सन्देशको सुन

शामे ग़म कुछ उस निगाहे नाज़ की बातें करो

बेख़ुदी बढ़ने लगी है राज़ की बातें करो

हो रहा है जहान में अन्धेर........ हदीसे शोलारुख़ां का श्रीगणेश कर।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आवेपते भ्रमति रोदिति मोहमेति,
    कान्तं विलोयति कूजति दीनदीनम_ !
    अस्ते हि भानुमाति गच्छति चक्रवाकी,
    हा ! जीवितेsपि मरणं प्रिय- विप्रयोग: !!

    As the sun sets,the female ruddy skylark(chakvi) departs from her lover and begins to tremble,to go hither and thither(here n there),to weep, to become senseless also looks for her beloved and cries pathetically. oh! The separation of the beloved is truly a kind of death even in life- time.

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