मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

शाइरी










                             दो कौड़िओं को जैसे हो दावाये दो जहां
                            है चश्मे नातवां को दिमागे रुखे जमाल




 (मेरी अल्प सामर्थ्य एवं कम-सवाब आँखों को तेरा देदीप्यमान मुखमंडल देखने की इच्छा ऐसी ही है
जैसे दो कौड़ियाँ दोनों जहां का दावा करने के बारे में सोचने लग जाएँ !!!)


शनिवार, 4 जुलाई 2009

भाषा एवं साहित्य

आओ करें महफ़िल पे ज़रे ज़ख़्म नुमायां

चर्चा है बहुत बे सरो सामानि ए दिल का

ऐ मेरे दिल , माना कि तुम्हारा मौन तुम्हारी गम्भीरता और सदाशयताके नाते है, लेकिन अब इसकी व्याख्या तुम्हारी अकिञ्चनता के रूप में होने लगी है। वक़्त है कि तू बता दे कि तू सरापा नाला ए मुहब्बत है।तेरी चुप्पी अपने असामर्थ्य से नहीं बल्कि श्रवण केधैर्य की अनुपलब्धता के कारण थी।

बता कि तेरा हर दाग़े दिल इक तुख़्म है सर्वे चराग़ां का ।

फ़िराक़ के सन्देशको सुन

शामे ग़म कुछ उस निगाहे नाज़ की बातें करो

बेख़ुदी बढ़ने लगी है राज़ की बातें करो

हो रहा है जहान में अन्धेर........ हदीसे शोलारुख़ां का श्रीगणेश कर।